चोलकालीन मूर्तिकला और उनकी विशेस्ताएं क्या है?:-

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चोलकालीन मूर्तिकला और उनकी विशेस्ताएं :-


चोलकालीन मूर्तिकला और उनकी विशेस्ताएं क्या है?:-
चोलों ने अपने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना पल्लवों को परास्त कर दक्षिण में किया। चोल वंश ने 850 ई. से 1279 ई. तक शाशन किया।  चोल शासक उत्साही निर्माता थे और उनके समय में कला एवं स्थापत्य में महत्वपूर्ण प्रगति हुई।
चोल युग के कलाकारों ने अपनी कुशलता का प्रदर्शन पाषाड मंदिर एवं मूर्तियां बनाने में किया है। चोलों के काल में बनायीं गयी कांस्य मूर्तिकला बिशेष रूप से विश्व में प्रशिद्ध है। ये कांश्य मुर्तियां बड़ी मात्रा में दक्षिण-पूर्व एशिया के देशो में पायी जाती है,क्योंकि ये क्षेत्र लम्बे समय तक चोलों के प्रभाव में रहे थे।
द्रविण वास्तुकला का जो प्रारम्भ पल्लव काल में हुआ उसका चरमोत्कर्ष चोल काल में देखने को मिलता है। इसलिए चोलकाल को दक्षिण भारतीय कला का ‘स्वर्ण युग’ कहा जा सकता है।
चोल मंदिरों में सर्वाधिक परिपकवा तथा राजसी मंदिर तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर है ,जिसकी मूर्ति ने एक नविन परिपक़्वता हाशिल कर ली है, जो की मूर्तियों  मनोहारी ढंग से चित्रित रूपरेखाओं, उनकी  नियत मुद्राओं ,उत्तम अलंकरण,भव्य चेहरों और कुछ जीवंतता में स्पष्ट हो जाती है।
ये सब  मिलकर कलाकृति की सौम्यता में वृद्धि करते है। चोल कला ने न केवल श्रीलंका के कला को प्रभावित किया,बल्कि यह जावा और सुमात्रा(इंडोनेशिया)  पहुँच गयी थी।
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चोलकालीन मूर्तिकला की विशेषतायें:-

 
चोलमूर्तिकला मुख्यतः वास्तुकला कि सहायक थी, अधिकांश मूर्तियों का प्रयोग मंदिरों को सजाने में किया गया। चोल कलाकारों ने बहुसंख्या में पत्थर तथा धातु की मूर्तियों का निर्माण किया,जिसमे धातु मूर्तियों की अधिकता थी। शैव मतावलम्बी होने के कारण चोल मूर्तिकला में शिव और शिव परिवार का मूर्तन प्रमुखता से हुआ है।
धातु मूर्तियों  में भी कांश्य मूर्तियों की प्रधानता रही है। इसमें नटराज  की कांश्य प्रतिमा सर्वोत्कृष्ट है। इसे चोल कला का सांस्कृतिक निकष(कसौटी) कहा गया है।  पत्थर की मूर्तियां अधिकांशतः मंदिरो के सजावट में ही इस्तेमाल हुईं हैं,  जबकि धातु  या कांश्य की मूर्तियां स्वतंत्र रूप से निर्मित हुई हैं।…………Join Telegram
चोल मूर्तियों में आकृतियां इतने उभार के साथ बनायीं गयी हैं कि वे दिवार के सहारे सजीव खड़ी प्रतीत होती हैं,उनके अंग-प्रत्यंग बड़ी सूक्ष्मता से गढ़े गये हैं। चोलकालीन कलाकारों द्वारा बनाये गये मूर्तियों में देवी-देवतावों की मूर्तियां अधिक हैं।

चोलकालीन मूर्तिकला के प्रमुख उदाहरण:-

 
 चोलकालीन मूर्तिकला
चोलकालीन मूर्तिकला


ग्यारहवीं शताब्दी में चोल शिल्पकारी का एक अच्छा उदाहरण गजासुर संहार मूर्ति के रूप में शिव का उभरा हुआ उत्कीर्ण रूप है।  इसमें क्रुद्ध महादेव उस हाथी राक्षस  का संहार कर हर्षोन्माद के ओजश्वी नृत्य में व्यस्त हैं।
तमिलनाडु के थिरुवरंगुलाम से नटराज की विशाल कांश्य प्रतिमा तथा एक अर्धनारीश्वर रूप की प्रतिमा प्राप्त हुई है। तेरहवीं शताब्दी में चोल कला के उत्तरवर्ती चरण में भू-देव को बिष्णु की कनिष्ठ पत्नी के रूप में दर्शाकर मूर्ति रूप में चित्रित किया गया है।
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